तुम

रात मुझे ज्ञात है,
लेटा था जब मैं नितांत्त अकेला
स्वजनों से दूर होने की टीस
कसोसती थी मन को तब
मेरी हथेली पे आकर
रख दिया था हाथ तुमने।

महसूस की थी मैंने
तुम्हारे हाथों की ऊष्णता
नम्रता तुम्हारी ऊँगलियों की
समाप्त हो गया क्षण में
अकेलेपन का आभास
लगा, कोई है चिर-परिचित,
बैठा यहीं मेरे पास।

पर ज्यों ही मैंने मुट्ठी बाँधी,
चाहा पकड लुँ हाथ तुम्हारा,
रोक लूँ जाने से तुमको
प्रिये , जा चुकी थी तुम
पीछे छोड मुझे एकांत।

अब एकांत है, अकेलापन नहीं,
क्योंकि, है अब भी मेरी हथेली में,
अहसास तुम्हारी ऊँगलियों की
जोकि, त्वचा के पार, रक्त में मिलकर,
छेडकर मेर् स्नायु तंत्र,
मेरे वजूद का हिस्सा बन गई है।

अच्छा ब्लॉग

बहुत धन्यवाद.

tum

Kya baat hai sir ji,

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