मेरा राष्ट्र सो रहा है

रे शोर ना मचा यहाँ
कि मेरा राष्ट्र सो रहा है ।।

अनभिज्ञ सठिसाई जवानी से
विमुख बीती भव्य कहानी से ।
वर्तमान से भी हो अनजान
सो रहा है यह चादर तान ।।

गंगा में बह गया हरिद्वार
कोशी-संतप्त हुआ बिहार ।
सुनामी में बहा दक्षिण प्रदेश
भूकंप से भी जागा ना देश ।

विपदा-नियंत्रण को रखकर ताक
शासक कर रहा हवाई झाँक ।
नहीं पता किसी को क्या हो रहा है
कि अभी मेरा राष्ट्र सो रहा है ।।

जनता सो गई सौंप के सत्ता
सरकार भी सो गई अलबत्ता ।
शासन-कुशासन का करे ना ध्यान
यहाँ खर्राटे ले रहा संविधान ।

केवल सत्ता-सेवा को आतुर तंत्र
जनता व्याकुल - कैसा यह जनतंत्र ।
प्रदर्शनकर्ता यहाँ जेल को जाते
और आतंकी मासूम कहलाते ।

रक्षक सोते यहाँ चैन के संग
जब बहनों का होता मानभंग ।
समाज भी अपनी अस्मिता खो रहा है
फिर भी मेरा राष्ट्र सो रहा है ।।

भूगर्भ बेच आए कौड़ी के दाम
सस्ते में बाँट आए आसमान ।
तोप, विमान किए दलाली पे राजी
ताबूतों में भी होती सोदेबाजी ।

जो चाहो, जिस दाम में, मिल जाएगा
बस थोड़ी मलाई सत्ता पक्ष खाएगा ।
लूटते मंत्री, मौन खड़ा रहे प्रधान
पर,'हाथ जनता के साथ' का करे गान ।

अन्ना का खुलेआम अपमान हो रहा है
और मेरा राष्ट्र है कि सो रहा है ।।

चले थे कभी हम सीना तान
विकास का छूने को आसमान ।
संजीए समृद्ध भारत का सपना
चीन अगला पड़ाव था अपना ।

पर हाय! प्रयाण की यह कैसी गाथा
कि विकास-दर हो गया है आधा

किसान विवश हो क्रय करे अनाज
औ' महंगाई से त्रस्त हो मध्य समाज ।
अंधेर नगरी का कैसा हाल है आज
कि मधु से सहंगा बिकता प्याज ।

रूपए का नित्य अवमूल्यन हो रहा है
तथापि मेरा राष्ट्र सो रहा है।।

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.

Theme by Danetsoft and Danang Probo Sayekti inspired by Maksimer