प्रथम स्पर्श

नयनों की आभा पलकों से
छलक, दूजे नयनों में प्रशस्त हुई ।
प्रश्न, उत्तर, प्रतिप्रश्न, प्रत्युत्तर
प्रति-स्मिता में परिणत हुई ।

ना-हाँ-शायद-अवश्य,
संशय के गुजरे क्षण-विशेष ।
तितलियों की परस्पर भाषा से
प्रेमसिक्त हुए दृग अनिमेष ।

दो-युग्म कदमों की उलटी दिशा
दो प्राण परस्पर निकटस्थ हुए ।
फिर हाँ, फिर ना, फिर संकोच,
दो अधर पुनः आश्वस्त हुए ।

उन्नत मुख, झुकी पलकों की
भाषा पढ़ी उत्सुक उर ने ।
तीव्र सांसों का फिर संग दिया
हृदय के तीव्रतर स्वर ने ।

काँपते, अधखुले होठों से
प्रेयसी ने कुछ कहा ना, पर,
प्रियतम के आकुल आँखों ने
पढ़ लिये प्रिया-समर्पण के स्वर ।

वक्षों पे प्रथम स्पर्श, निकले
प्रिया-कंठ से सिसकी बनकर ।
मधुर आह को गिरने से प्रिय ने
रोका अधरों पे अधर धर कर ।

सतः – कौमार्य - सिक्त होठों पे
प्रियतम के होठों का प्रथम स्पर्श ।
व्यग्र तन, त्यों संतृप्त हो,
हो गया स्वतः प्रशांत सहर्ष ।।

प्रशांत,
बहूत ही सुंदर अभिव्यक्ति है कुछ अनमोल क्षणों का ।


वक्षों पे प्रथम स्पर्श निकले
प्रिया-कंठ से सिसकी बनकर ।
मधुर आह को गिरने से प्रिय ने
रोका अधरों पे अधर धर कर ।

.....और कवि ने उस मधुर आह को गिरने से बचाकर यहाँ शब्दों में यों सजा दिया ।

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