noon sea snow

मेरा राष्ट्र सो रहा है

रे शोर ना मचा यहाँ
कि मेरा राष्ट्र सो रहा है ।।

अनभिज्ञ सठिसाई जवानी से
विमुख हो बीती भव्य कहानी से ।
वर्तमान से भी हो अनजान
सो रहा है यह चादर तान ।।

गंगा में बह गया हरिद्वार
कोशी-संतप्त हुआ बिहार ।
सुनामी में बहा दक्षिण प्रदेश
भूकंप से बी जागा ना देश ।

विपदा-नियंत्रण को रखकर ताक
शासक कर रहा हवाई झाँक ।
नहीं पता किसी को क्या हो रहा है
कि अभी मेरा राष्ट्र सो रहा है ।।

चलो पहाड़ बुला रहा है

चलो पहाड़ बुला रहा है।

यहाँ पग प्रयाण को तत्पर
वहाँ खड़ा वो दुर्गम भूधर
चुनौती दे क्या चिढ़ा रहा है?
चलो पहाड़ बुला रहा है।

छोटे-लंबे कदम बढाकर
पादप-पाहन पे धूल उडाकर
पहुँचना जहाँ वो श्रृंग खड़ा है
देखें हम हैं या तुंग बड़ा है

उत्थान-अवसान की राहें लेते
कभी चट्टान को गलबाहे दैतै

बस एक बात ही सुनते जाना
चलो पहाड़ बुला रहा है।

नज़र

विहगम, विहसते व्योन पे
चमकते चाँद के चरण-तल
तिल की तरह का तारा
कि
कहा नभ ने, लगा काजल की कोर
हनु पे स्मितप्रभ शिशु को,
"हाय! नज़र ना लगे किसी की नेरे शशि को!"

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